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मिडिल ईस्ट में मिसाइलों की गूंज! ईरान ने क्यों नहीं छोड़ा अपने 'मध्यस्थ' देशों को भी? अमेरिका के ठिकानों पर हमलों के दावों से बढ़ा तनाव

मिडिल ईस्ट एक बार फिर गंभीर सैन्य तनाव के दौर से गुजरता दिखाई दे रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के बीच कई ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे दी है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और क्षेत्रीय दावों के अनुसार, ईरान ने अमेरिका से जुड़े सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए कुवैत, बहरीन, क़तर और जॉर्डन की दिशा में मिसाइल एवं ड्रोन हमले किए जाने का दावा किया है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सभी मामलों में नहीं हो सकी है और संबंधित देशों की ओर से अलग-अलग स्तर पर प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

अमेरिका-ईरान तनाव का नया मोर्चा

पिछले कुछ समय से अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव लगातार बढ़ रहा है। ईरान का आरोप है कि उसके खिलाफ होने वाले कई सैन्य अभियानों में खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल किया जाता है। इसी कारण ईरान बार-बार यह संदेश देता रहा है कि उसका निशाना सीधे उन देशों की सरकारें नहीं हैं, बल्कि उन ठिकानों पर मौजूद अमेरिकी सैन्य ढांचे हैं, जहां से उसके खिलाफ कार्रवाई की जाती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की रणनीति लंबे समय से यह रही है कि वह अरब देशों के साथ सीधे टकराव से बचने की कोशिश करता है, लेकिन यदि किसी देश की जमीन से उस पर हमला होता है तो वह जवाबी कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटता।

कुवैत और बहरीन क्यों बने निशाना?

रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया। इन दोनों देशों में लंबे समय से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी रही है और यही कारण है कि ईरान इन्हें रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानता है।

बताया जा रहा है कि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने बयान जारी कर कहा कि उसकी नौसेना और एयरोस्पेस फोर्स ने संयुक्त अभियान के तहत कुवैत के अरिफजान और अली अल सलेम एयरबेस तथा बहरीन के जुफैर और शेख ईसा एयरबेस को निशाना बनाया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल – क़तर क्यों?

पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा क़तर को लेकर हो रही है। क़तर लंबे समय से क्षेत्रीय कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। कई मौकों पर उसने अमेरिका और ईरान के बीच संवाद स्थापित कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी अमेरिकी सैन्य अभियान में क़तर स्थित अमेरिकी सुविधाओं का उपयोग हुआ हो, तो ईरान उसे भी सैन्य लक्ष्य मान सकता है। यही वजह बताई जा रही है कि क़तर का नाम भी इन घटनाओं में सामने आया।

हालांकि क़तर की ओर से लगातार यह कहा जाता रहा है कि वह क्षेत्र में शांति और संवाद का समर्थक है तथा किसी भी सैन्य टकराव को बढ़ावा नहीं देना चाहता।

बॉबी नकवी ने क्या कहा?

मिडिल ईस्ट मामलों के जानकार और गल्फ क्षेत्र से जुड़े पूर्व संपादक बॉबी नकवी के अनुसार, क़तर की विदेश नीति अपेक्षाकृत संतुलित मानी जाती है। उनका कहना है कि क़तर अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध बनाए रखते हुए ईरान के साथ भी संवाद कायम रखने की कोशिश करता है।

उनके अनुसार, यदि ईरान को यह विश्वास हो जाए कि किसी अमेरिकी कार्रवाई के लिए किसी देश की जमीन या सैन्य सुविधा का उपयोग किया गया है, तो वह बिना अधिक देर किए जवाबी हमला कर सकता है। यही कारण है कि इस बार कथित तौर पर कुवैत और बहरीन के साथ-साथ क़तर का भी नाम सामने आया।

जॉर्डन भी चर्चा में

जॉर्डन भी इस पूरे घटनाक्रम में चर्चा का विषय बना हुआ है। क्षेत्रीय सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि जॉर्डन का सामरिक महत्व काफी अधिक है। हालांकि वहां की सरकार लगातार क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने की अपील करती रही है।

यदि किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि जॉर्डन के आसपास बढ़ती है तो उसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।

सुरक्षा एजेंसियां हुईं अलर्ट

बताया जा रहा है कि कथित हमलों की खबरों के बाद कई देशों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर दी।

कुवैत की सेना के जनरल स्टाफ ने कहा कि उनका एयर डिफेंस सिस्टम संभावित मिसाइल और ड्रोन खतरों पर नजर बनाए हुए है और आवश्यक कार्रवाई के लिए तैयार है।

वहीं क़तर के गृह मंत्रालय ने लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी। नागरिकों से कहा गया कि वे आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षित स्थानों पर रहें, घरों के भीतर रहें और खिड़कियों से दूर रहें। ऐसे सुरक्षा अलर्ट इस बात का संकेत हैं कि क्षेत्र में तनाव को गंभीरता से लिया जा रहा है।

यूएई और सऊदी अरब क्यों रहे अलग?

इस पूरे घटनाक्रम में एक और बात चर्चा का विषय बनी कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब का नाम कथित हमलों में सामने नहीं आया।

विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हो सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंधों में कुछ सुधार देखने को मिला है। वहीं यूएई भी कई आर्थिक और कूटनीतिक स्तर पर ईरान के साथ संपर्क बनाए हुए है।

हाल के समय में ऐसी रिपोर्टें भी सामने आई थीं कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण फंसी ईरान की कुछ धनराशि को लेकर कूटनीतिक प्रयास हुए थे, जिनमें क़तर और यूएई की भूमिका चर्चा में रही थी।

क्या मध्यस्थ की भूमिका प्रभावित होगी?

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि किसी ऐसे देश का नाम सैन्य घटनाओं में आता है जो शांति वार्ता का मध्यस्थ भी है, तो क्या वह निष्पक्ष भूमिका निभा पाएगा?

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी मध्यस्थ देश की विश्वसनीयता उसके संतुलित रवैये पर निर्भर करती है। यदि उस पर किसी पक्ष का प्रभाव अधिक दिखाई देता है तो वार्ता प्रक्रिया कठिन हो सकती है।

हालांकि अभी तक क़तर ने आधिकारिक तौर पर अपनी मध्यस्थ भूमिका से पीछे हटने जैसी कोई बात नहीं कही है।

पूरे मिडिल ईस्ट में बढ़ी चिंता

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर पूरे मिडिल ईस्ट पर पड़ रहा है। क्षेत्र के कई देशों ने अपनी सुरक्षा तैयारियां बढ़ा दी हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी लगातार संयम बरतने की अपील कर रहा है ताकि स्थिति व्यापक युद्ध में न बदल जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्षों के बीच सैन्य कार्रवाई का सिलसिला जारी रहता है, तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार मार्गों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है।

मिडिल ईस्ट में मौजूदा हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के दावे और क्षेत्रीय देशों की सुरक्षा तैयारियां इस बात का संकेत हैं कि तनाव अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। हालांकि कई दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, इसलिए आधिकारिक बयानों और विश्वसनीय स्रोतों से आने वाली जानकारी पर नजर रखना आवश्यक है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह तनाव सीमित सैन्य कार्रवाई तक रहता है या फिर कूटनीतिक प्रयासों के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया जा सकेगा। फिलहाल पूरे पश्चिम एशिया की निगाहें अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

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